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बदलते परिवेश में नारियों की स्थिति

 

वैदिक काल में महिलाओं को पुरुषों के समतुल्य दर्जा दिया  गया था। नारियां सदैव पूजनीय होती थी। विवाह में भी वर चुनने के लिए वह स्वतंत्र हुआ करती थी। समाज के हर क्रियाकलापों में पुरुषों व महिलाओं की समान भागीदारी हुआ करती थी। मनुस्मृति के अनुसार- जहां नारियों की पूजा होती थी वहां देवता वास करते थे।

यथा-   “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमयंते तत्र देवता”

फिर उत्तर वैदिक काल में नारियों की सुदृढ़ स्थिति शनैः शनैः प्रभावित होती गई। इसी काल में परिवार के मुखिया के रूप में पुरुष को दर्जा प्राप्त हुआ पर महिलाएं भी समतुल्य ही साथ बैठा करतीं थीं। इस समय उच्च वर्ग की नारियां शिक्षा प्राप्त कर सकती थी पर निम्न वर्ग के नारियों को शिक्षा से वंचित कर दिया गया। उन्हें घर की चारदीवारी व घरेलू काम-काजों में ही बांध दिया गया परंतु घर में पुरुष के न होने से वह घर के मुखिया की भांति कार्य करती थी।

मध्यकाल में मुस्लिमों के आगमन के पश्चात भारतीय सामाजिक व्यवस्था बहुत अधिक प्रभावित हुई। इसी समय नारियों की सुदृढ़ स्थिति भी बहुत अधिक प्रभावित हुई। महिलाओं को धन तथा भोग की वस्तु समझा जाने लगा। युद्ध में बहुमूल्य हीरे जवाहरात रत्नों को लूटने के साथ-साथ नारी को भी सामान के समान समझकर लूट कर ले जाया जाने लगा।  जिस कारण पर्दा प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह व जौहर प्रथा जैसी कुरीतियां प्रारंभ हुई। जिससे महिलाओं की स्थिति दयनीय होती चली गई।

अकबर कालीन भारत में महिलाओं की स्थिति में सुधार करने का कुछ प्रयास किया गया।  यह सुधार प्रायः ना के बराबर ही रहा। ब्रिटिश साम्राज्य राज्य में भी स्थिति महिलाओं की इतनी अच्छी नहीं रही, फिर भी विलियम बेंटिक काल में जिसमें महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय आए, महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए 1883 ईस्वी में विधिवत सुधार किया गया, तब जाकर सती प्रथा एवं बाल विवाह जैसी कुप्रथा पर रोक लगे लेकिन इतने ही सुधार से नारियों की समस्या  व इनका कल्याण संभव नहीं था और अन्य कुप्रथा जो मध्य काल से चलती आ रही थी इस काल में भी चलती रही।

राष्ट्रीय आंदोलन के दरमियां महात्मा गांधी जी एवं अन्य क्रांतिकारी नेताओं के द्वारा नारियों  को जागरूक करने का प्रयास किया जाता रहा लेकिन यह भी पूर्ण संतोषजनक नहीं रहा। भारतीय आजादी के बाद डॉक्टर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने संविधान के द्वारा नारियों को पुरुषों के समान अधिकार हर क्षेत्रों में विधिवत दिया गया, तब जाकर नारियों की स्थिति में सुधार की गति तीव्र पकड़ी। फिर भी रूढ़ीग्रस्त समाज में आज भी दकियानूसी विचार रखने वाले एवं खाप पंचायत में विश्वास रखने वाले आज भी नारियों को मध्य काल की भांति ही रखने में अधिकतम विश्वास रखते हैं । जिससे आज भी नारियां काफी प्रताड़ित हो रही है।  यह समस्या किसी एक जाति एक समुदाय एवं एक धर्म व एक संप्रदाय के बीच की नहीं है।  यह सभी  क्षेत्रों में जहर की भांति फैला हुआ है।  पर्दा प्रथा दहेज प्रथा एवं विभिन्न प्रकार के शोषण से महिलाएं जकड़ी हुई है जिसके आधुनिक काल में भी महिलाओं की जागरूकता की काफी कमी है।

केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार के अथक परिश्रम से भारत के कई राज्यों में  महिलाओं के उत्थान के लिए कुछ खास आरक्षण का प्रावधान अलग-अलग क्षेत्रों में किया गया है । 21वीं सदी के प्रथम दशक के प्रारंभ से ही इसमें ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए महिलाओं को नौकरी में विशेष आरक्षण का प्रावधान किया गया है। फलतः कुछ समानता की झलक अब दिखने लगी है।

हम भारत के प्रत्येक नागरिकों का पुनीत कर्तव्य बनता है कि सामाजिक गाड़ी चलाने के लिए गाड़ी के दोनों पहियों को प्रत्येक क्षेत्र में सुदृढ़ करने की प्रबल भावना रखनी चाहिए। तभी पूरे मानव समाज का पूरा कल्याण एवं उत्थान हो सकता है और इस स्थिति में भारत ही नहीं पूरे विश्व की महिलाएं जागरूक होकर विश्व को आगे बढ़ाने में सक्षम हो सकती हैं।

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